पशु स्वास्थ्य

पशु स्वास्थ्य

प्रगति की मंजिलें :-

यादों का सफर आपको पशु स्वास्थ्य ग्रुप के अतीत के कार्यों और उपलब्धियों की एक झलक देगा।

80 के दशक में...

फील्ड में कार्य करने वाले पशु चिकित्सकों को निदान सेवाएं उपलब्ध कराने हेतु पशु रोग निदान प्रयोगशाला (एडीडीएल) की स्थपाना की गई।

इस प्रयोगशाला का उद्देश्य शोध कार्य करना तथा पशु चिकित्सकों को रोग निदान में प्रशिक्षण देना भी है।

प्रयोगशाला के एफएमडी(खुरपका और मुँहपका रोग)  टाइपिंग केन्द्र को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के “एफएमडी जनपदिक रोग विज्ञान प्रोजेक्ट” के एफएमडी वायरस टाइपिंग केन्द्र के रूप में मान्यता दी गई ।

ऊटी, नीलगिरी जिला, तमिलनाडु में खुरपका और मुँहपका रोग  के नियंत्रण के लिए प्रायोगिक तौर पर योजना शुरू की गयी। इसके बाद यह योजना एफएमडी नियंत्रण प्रोजेक्ट (एफएमडी-सीपी) के तहत केरल में आसपास के जिलों, तमिलनाडु और कर्नाटक में शुरू की गई।

ट्रोपीकल थेलेरियोसिस के प्रति टीका विकसित किया गया।

90 के दशक में...

स्ट्रिप का उपयोग कर आसान और सबसे सस्ते तरीके से उप नैदानिक स्तन शोथ का पता लगाने के लिए तकनीक विकसित की गई।

आसान तथा प्रभावी कृमि नियंत्रण के लिए दवाई मिलाकर पशु आहार विकसित किया।

परजीवी कीड़ों से होनेवाली विभिन्न बीमारियों जैसे थेलेरियोनिस, बेबीसियोसिस तथा एनाप्लाजामोसिस के लिए ELISA (एक परीक्षण) मानकीकृत किया।

एचएस (गलघोंटू) के लिए एक सुरक्षित एवं प्रभावी टीका विकसित किया जो लंबी अवधि के लिए प्रतिरोधक क्षमता प्रदान करेगा।

ब्ल्यू टंग के निदान के लिए रीएजेन्ट विकसित किया गया।

परजीवी के जैविक नियंत्रण पर एक अनुसंधान परियोजना शुरू की गई। यह रासायनिक दवा का विकल्प उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया गया।

2000 के दशक में

ब्रेसेला टीके के उत्पादन की मदद की।

केरल सरकार की खुरपका-मुंहपका रोग के नियंत्रण के आत्मनिर्भर मॉडल, पशु रोग नियंत्रण परियोजना, विकसित करने में मदद की।

निदान में उपयोग के लिए खुरपका और मुँहपका रोग  के लिए मोनोक्लोनल प्रतिरक्षक विकसित किए।

ब्रूसीलोसिस के निदान के लिए फ्लोरोसेंस पोलेराइजेशन ऐसे (एफपीए) को मानकीकृत किया।

गोजातीय पशुओं के वीर्य में वीएचवी-1 की जांच के लिए एक बेहद संवेदनशील रीयल टाइम पीसीआर तकनीक को मानकीकृत किया।

BACTEC MGIT 960 सिस्टम का उपयोग कर गोजातीय क्षय रोग तथा जोनेस रोग का शीघ्र पता लगाने की प्रणाली का मानकीकरण। गोजातीय ब्रूसीलोसिस (संक्रामक गर्भपात) के निदान हेतु प्रतिस्पर्धी एलिसा (सी-एलिसा) विकसित की गई।

इम्युनो केप्चर एलिसा (आईसी-एलिसा) विकसित की है जिससे बोवाइन गामा इंटरफेरॉन के आकलन के माध्यम से गोजातीय क्षय रोग का शीघ्र निदान हो सके।

एक ऊतक कल्चर निश्चलित आईबीआर टीका विकसित किया।

वर्तमान...

पशु चिकित्सा टीके

गोजातीय ब्रूसीलोसिस (संक्रामक गर्भपात) के रोग निरोध तथा चिकित्सकीय प्रयोग  के लिए ग्लायको-कंजूगेट वैक्सीन का कार्य प्रगति पर है।

वायरस लाइफ पार्टीकल (वीएलपी) टीका विकसित किया गया है। यह एफ एम डी के वायरस ‘ओ’ के लिए है। इस पर और अधिक कार्य हो रहा है।

एक संयुक्त टीका जिसमें एमएफडी और टीटनेस टॉक्साइड प्रतिजन शामिल है। उसका जानवरों के अध्ययन में उत्साहजनक परिणाम देखने को मिला तथा आगे कार्य प्रगति पर है।

एक कीडा विरोधी रिकॉम्बिनेंट टीका विकसित किया गया है।

एन्टरोटोक्सामीया और भेड़ चेचक के प्रति एक रिकॉम्बिनेंट संयुक्त टीका विकसित किया जा रहा है।

क्लोस्ट्रीडियम संक्रमण के खिलाफ नौ प्रकार के क्लोस्ट्रीडियम एसपीपी को शामिल कर बहुसंयोजक टीका विकसित करने का कार्य प्रगति में है।

विभिन्न टीकों की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का अध्ययन करने के लिए विभिन्न सायटोकिन आधारित परख के विकास हेतु अनुसंधान चल रहा है।

निदानः-

गोजातीय क्षय रोग (बीटीबी) तथा जोनेस रोग (जेडी) के पुष्टकारी निदान के लिए एलिसपोट परख ELISP pot assay भी विकसित किया जा रहा है, नैदानिक नमूनों में वायरस का पता लगाने के लिए एक लूप मीडीयेटड आइसोथर्मल एम्प्लीफीकेशन (एल ए एम पी) का मूल्यांकन किया जा रहा है जिससे एफएमडी वायरस का सटीक तथा तेजी से निदान हो सके।

गैर संरचनात्मक प्रोटीन के प्रतिरक्षक का पता लगा कर एफएमडी संक्रमित और टीका लगे हुए पशुओं के बीच अंतर करने के लिए एक ELISA (एलीसा) विकसित किया गया है।

रेबीज के निदान के लिए आरटी-पीसीआर, चूहों के टीके, सांस्कृतिक अलगाव और क्लोरोसेंट एंटीबॉडी तकनीक से सुविधाएं विकसित की गई है और नियमित रुप से उनका इस्तेमाल किया जा रहा है।

परामर्श सेवाएं

वीर्य केन्द्रों के लिएः-

वैज्ञानिक प्रजनन तकनीक (उच्च अनुवांशिक गुण वाले सांडों का चयन तथा उनके वीर्य का कृत्रिम गर्भाधान (एआई) द्वारा एक बड़ी आबादी पर उपयोग) अपनाते वक्त यह बहुत महत्त्वपूर्ण है कि संक्रमित वीर्य के माध्यम से रोगों का प्रसार कम करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएं। अच्छी गुणवत्ता के वीर्य उत्पादन के लिए यह जरूरी है कि इन वीर्य केन्द्रों के साँड रोगों से मुक्त रहें।

जैव सुरक्षा उपायों पर राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड संचालित फार्म्स को सलाह देता है तथा संक्रमित वीर्य द्वारा रोगों के प्रसार को कम करने के लिए प्रोटोकोल विकसित करता है।

ऐसे मॉडल वीर्य स्टेशन बनाए जाने का लक्ष्य है, जिसके जैव सुरक्षा प्रोटोकोल का देश के सभी वीर्य स्टेशनों द्वारा अनुसरण किया जा सकता है।

संतति परीक्षण परियोजना क्षेत्रः

संतति परीक्षण परियोजना क्षेत्रों में स्थानीय विशिष्ट रोग नियंत्रण रणनीतियां बनाना जिससे रोग मुक्त साँड बछड़े पाने में मदद मिले।
संतति परीक्षण परियोजना क्षेत्र के गांवों में पशुधन आबादी के स्वास्थ्य सुधार के व्यापक परिप्रेक्ष्य की सुविधा बनाना।

एनडीडीबी की अनुसंधान एवं विकास तथा फील्ड के बीच अंतराफलक

फील्ड में पशु स्वास्थ्य समस्याओं को पहचनाने के लिए फील्ड तथा अनुसंधान एवं विकास के बीच उत्प्रेरक के रूप में कार्य करना तथा सूचित हस्तक्षेपों का परीक्षण करना जो किसानों के लिए उपयोगी होते हैं।

सहकारी समितियों को समर्थनः-

पशुओं के स्वास्थ्य के मुद्दों पर किसानों तथा विभिन्न दुग्ध सहकारी समितियों के निदेशक बोर्ड में जागरूकता बनाने की सुविधा।